भक्ति आराधना |

|| आचार्य श्री विद्यासागर जी द्वारा भगवती आराधना अध्यापन-प्रवचन अंश ||

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
08/08/2013 – तप की महिमा अपरंपार है
परमपूज्य जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज ने रामटेक स्थित भगवान श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में उद्बोधन दिया है कि, रोग होता है, जन्म-मरण रूप, उसकी श्रेष्ठ औषधि तप है । अच्छी चीज के लिए विज्ञापन की आवश्यकता नही होती है वह स्वयं मे विज्ञापन होती है । कलकत्ता मे एक वृक्ष है, किसी को पता नही है कि उस वृक्ष का मूल भाग कैनसा है ? संसार रूपी महादाह से जलते हुए प्राणी के लिए तप जल घर है, जैसे सूर्य की किरणो से जलते हुए मनुष्य के लिए धाराधर होता है । तप सांसरिक दुखो को दूर करता है । सम्यक तप करने से पुरूष बंधु की तरह लोगो को प्रिय होता है । तप से व्यक्ति सर्व जगत का विश्वासपात्र होता है । पंचकल्याणक आदि सुख तप से प्राप्त होते है । तप मनुष्य के लिए कामधेनु और चिंतामणि रत्न के समान है । आप लोगो को रोने की आदत पड गयी है । संसार मे मै किसी से बैर नही करूंगा ऐसे भाव रखना चाहिए । जब शारीर को भोजनरूपी वेतन दिया जाता है। उस पर दया न करके उसको तप की साधना मे लगाना चाहिये। तप भावना मे जिसको आनंद नही आता है उसको अभी संयम बहुत दूर है । जीव पर दया की जाती है, शारीर तो जड है पुद्गल है उस पर दया नही करना चाहिये । यदि शारीर का पोषण करते है तो आत्मा का शोषण होता है । संज्ञाये तो बढती चली जाती है और कार्य करने की क्षमता बढती जाती है । भावना जितनी भाओगे उतनी विशुद्धि बढती जायेगी । संयम का फल “इच्छा निरोधो तपः” होना चाहिये ।

07/08/2013 – एक क्षण का क्रोध हमारे जीवन को संपूर्णतः नष्ट कर देता है
परमपूज्य जैनाचार्य 108 श्री विद्यासागरजी महाराज ने रामटेक स्थित भगवान श्री शांतिनाथ दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र में उद्बोधन दिया है कि क्रोध रूपी आग मनुष्यों के धर्मवृत को जलाती है । यह क्रोध रूपी आग अज्ञानरूपी काष्ठ से उत्पन्न होती है । अपमान रूपी वायु उसे भडकाती है । कठोर वचन रूपी उसके बडे स्फुलिंग है । हिंसा उसकी षिखा है और अत्यंत उठा बैर उसका धूम है । यदि व्यक्ति कषाय करता तो उसका पाप का प्रमाण वढता है । कषाय करनेवालो के उपर हम कषाय नही करेगे, यदि हम यह सोच लेंगे तो मोक्ष की प्राप्ति होगी । अपमान होता है तो क्रोध रूपी अग्नी उसे प्रज्जवलित कर देती है । ज्ञान के द्वारा कषायो का हनन होता है । जब तब व्यक्ति के ऊपर ऋण रहता है तब तक उसे चैन नही आता है । क्रोध इस लोक एवं परलोक मे बहुत दोषकारक है ऐसा जानकर क्रोध का त्याग करना चाहिये । जीव तत्व को देखकर यदि अक्ल आये, उस जीव तत्व पर श्रद्धान हम कैसे माने। श्रध्दान अलग वस्तु है और चर्चा अलग वस्तु है । एक क्षण का क्रोध हमारे जीवन को संपूर्णतः नष्ट कर देता है । अतः हमें क्रोध को त्यागना चाहिये ।

भगवती आराधना गाथा 1311
थोड़ा सा असंयम संयम की शोभा को कम कर देता है। जैसे बकरी का बच्चा सुगन्धित तेल भी पिये फिर भी अपनी पूर्व दुर्गन्ध को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार दिक्षा लेकर भी अर्थात् असंयम को त्यागने पर भी कोई – कोई इन्द्रिय और कषाय रूप दुर्गन्ध को नहीं छोड़ पाते। मन से कभी समझौता नहीं करना क्योंकि वह गिरा देगा। मन को छोड़ भी नहीं सकते हैं उससे काम भी लेना है। पँचेन्द्रियों से वषीभूत हुआ प्राणी क्या – क्या नहीं करता है। कषाय का उद्वेग संज्ञी पंचेन्द्रिय में ही है। हम आदी हो गये है, काला अक्षर भैंस बराबर। श्वेत पत्र पर श्वेत स्याही से लिखा सो पढ़ो। अकेले काल रंग से लिख नहीं सकते, अकेले सफेद से भी कुछ नहीं कर सकते हैं। शुक्ल लेष्या का प्रतीक है। रात्रि में अंधकार में इधर – उधर क्यों नहीं देखते। आँखे बंद करके ही बैठते हैं सामायिक में । आँखों की ज्योति का सरंक्षण करना सीखो। इधर – उधर नहीं देखो।

भगवती आराधना गाथा 1300
तीव्र कषाय वाले के पास जाने से लोग डरते हैं। यह इन्द्रियों की दासता की कहानी की आदत पड़ी है। दूसरों के बारे में तो अचरज करता है लेकिन अपने बारे में अचरज नहीं करता। आपका इतिहास लाल स्याही से लिखा गया है वह पाँच पाप सहित है। करोड़पति होकर भी रोड़पति बन गये है। दरिद्रता रखो लेकिन कषाय की दरिद्रता रखो। ख्याति, पूजा, लाभ मिलने से कई लोगों के खून में वृद्धि हो जाती है। यह रस आत्मा को नहीं मन को मिलता है। डा. मान, सम्मान की खुराक नहीं दे पाते हैं। लागों को मान की खुराक होती है तो कहते हैं कि अखबार में मेरा नाम फ्रंट पर आना चाहिये और किसी का नाम नहीं आना चाहिये। ठंडे़ बस्ते में मन को रखना मोक्षमार्ग है। डा को मन की दवाई भी ढूंढ़ लेना चाहिये। मन के विजेता इंद्रिय विजेता बनोगे तभी मोक्ष मार्ग के नेता बनोगे। मान – अपमान को जिसने समझ लिया उसने मोक्ष मार्ग को समझ लिया।

भगवती आराधना गाथा 1283
साधु को यह प्रषिक्षण दिया जाता है कि आप व्यापार कर रहे हो यदि अचानक कुछ हो जाये तो सावधानी से अंतिम समय अच्छे से निकल जाये। रत्नात्रय ऐसा माल है जो कोई लूट नहीं सकता यदि लूट ले तो माला – माल हो जायेगा। दुनिया छूट जाये तो कोई बाधा नहीं लेकिन रत्नात्रय नहीं छूटना चाहिये। संसार रूपी महान वन से पार कर देते हैं। आना इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना जाना है। अपनी – अपनी इन्द्रियों को चोर के समान समझो वेल्कम नहीं वेल गो के बारे मे सोचो। पांच इंद्रिय और मन के द्वारा आप लूट रहे हैं। जो इंद्रियों का दमन करते हैं, कषायों का शमन करते हैं, देव उन्हे नमन करते हैं। इंद्रिय और मन को जो काबू में करता है वह सबको वष मे ंकरता है। आत्मा इंद्रियों से वषीभूत होकर भगवान को भूल जाती है। गुरू अपने आप में सहायक तत्व है मोक्ष मार्ग में । अनंत कालीन संस्कार रहते हैं जो छूटने के बाद भी बार – बार आ जाते हैं, उन्हे वह गुरू दूर करते रहते हैं। मोक्ष मार्ग में जो जाना चाहता है उसको मोह, प्रमाद से बचना चाहिये। यदि स्कूल में कोई प्रमाद करता है तो बैंच पर खड़ा कर देते हैं।

24 July
आप लोग कहते हैं हम दूर से आये हैं। आप पूजन करते हैं हम सुनते हैं आप लोग समूह में पूजन करते हैं और हमें अकेले बोलना पड़ता है। आप लोग चैके को टेªन का डिब्बा नहीं बनाया करें। कृत, कारित, अनुमोदना से भी पुण्य मिलता है। प्रमाण सामर जी ने आप लोगों को समझा कर भेजा होगा। उन्हें बिहार – झारखण्डा में बहुत साल हो गये हैं अब प्रदेष बदलना है। भारत में कानून अच्छे बन जाये तो बहुत समृद्धि हो सकती है। गुरू जी मारवाड़ी में बहुत अच्छी बातें कहते थे। आप लोग आहार देते – देते आहार लेने की भावना रखो मुनि, आर्यिका, एलक, क्षुल्लक आदि बनों।

16/06/2013 भगवती आराधना – अमरकंटक
वस्त्र कैसे – कैसे पहनते हैं लोग आज – आज लोग वस्त्र फटे पहन रहे हैं यह अमगेल माना जाता है। पहले बड़े लोग हाफ पैंट नहीं पहनते थे आजकल पहनने लगें हैं न उठ सकते हैं न बैठ सकते हैं ऐस वस्त्र पहनते हैं। बुद्धि जब तक ठिकाने में है कार्य कर लो। इन्द्रिय और कषाय रूप परिणाम बड़े दुष्ट हैं क्योकि ये आत्मा में उपद्रव पैदा करते हैं। इनको जीतना कठिन है। इन्द्रियों को जीतना सेमी फाइनल है और मन को जीतना फाइनल है। इष्ट भोग की प्राप्ति न होने पर अथवा प्राप्त भोग का विनाष होने पर महान् दुःख होता है। हमारे जीवन में मोह का गीला पन बना हुआ है। आज सोनोग्राफी में देख लेते हैं कि लड़का है या लड़की और उसको अलग करवा देते हैं यह ठीक नहीं हो रहा है। एक – एक व्यक्ति के द्वारा 8 – 10 बार गर्भपात करवाया जाता है। आज डिब्बे बंद खानपान हो रहा है पता नहीं है कैसा है कब का है।

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